RNI - NO : CHHHIN/2015/65786

February 5, 2023 1:05 AM

RNI - NO : CHHHIN/2015/65786

February 5, 2023 1:05 AM

‘जेल का फाटक टूट गया, लालू यादव छूट गया’, जानिए जब चारों तरफ से परेशानियों ने राजद सुप्रीमो को घेरा तब क्या हुआ

•बिहार की सियासत में बड़ा कद रखने वाले लालू प्रसाद यादव एक ‘जीवट’ इंसान भी हैं। उन्होंने अपने राजनीतिक और सामाजिक जीवन में बड़े उतार-चढ़ाव देखा। लालू हमेशा अपनी जीवटता के बल पर मुसीबतों से जीतते रहे। उनके जीवन में एक समय ऐसा आया, जब वे चारों तरफ से मुसीबतों से घिर गए। परेशान ऐसे कि समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें?

•जीवट इंसान रहे हैं लालू

You might also like

  • जब लालू यादव को मुसीबतों ने चारों तरफ से घेरा !
  • पत्नी को मुख्यमंत्री बनाकर खुद जाना पड़ा जेल !
  • लालू ने कैसे किया मुसीबतों का डंटकर मुकाबला ?

ट्रैक सीजी न्यूज़:

पटना : बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व केंद्रीय मंत्री और भारतीय राजनीति के लड़ाकू नेता लालू यादव एक बार फिर जिंदगी की जंग जीत गए हैं। हेल्थ संबंधी समस्याओं से दो-चार हो रहे लालू यादव का सिंगापुर में किडनी ट्रांसप्लांट पूरी तरह सफल रहा। ऑपरेशन के बाद लालू यादव को आइसीयू में शिफ्ट किया गया है। होश में आने के बाद लालू यादव ने हाथ हिलाकर अपने चाहने वालों का आभार जताया। उनके बेटे और बिहार के डेप्यूटी सीएम तेजस्वी यादव ने भी ट्वीट कर कहा कि पिता जी का गुर्दा प्रतिरोपण ऑपरेशन सफलतापूर्वक होने के बाद उन्हें ऑपरेशन थिएटर से आईसीयू स्थानांतरित किया गया। आज हम आपको बताते हैं कि मुसीबतों से निकलने की कला लालू बखूबी जानते हैं। उनकी सियासी जिंदगी में कई बार ऐसे मौके आए, जब वे पूरी तरह परेशान हो गए। एक ऐसा ही पल था, जब उनकी पत्नी राबड़ी देवी बिहार की मुख्यमंत्री बनीं। लालू यादव ने खुद स्वीकार किया है कि राबड़ी के पदभार ग्रहण करने के बाद मीडिया और उनके विरोधियों ने उन्हें अधिक परेशान करना शुरू कर दिया।

•चारों तरफ़ से परेशानी में घिरे लालू

वर्ष 2019 में प्रकाशित हुई लालू यादव की आत्मकथा ‘गोपालगंज से रायसीना’, जिसके लेखक वरिष्ठ पत्रकार नलिन वर्मा हैं। उसमें लालू यादव ने खुद के चारों तरफ से परेशानी में घिरने का विस्तार से जिक्र किया है। ‘गोपालगंज से रायसीना’ पुस्तक में उन्होंने अपनी परेशानी को ‘भंवर में भी तैरते रहे’ का नाम दिया है। जब राबड़ी देवी बिहार की कमान संभालती हैं। ठीक उसी वक्त मीडिया और विरोधी लालू को परेशान करने लगते हैं। लालू यादव ने स्वीकार किया है कि मीडिया के लोगों ने कहानियों के माध्यम से ये कहना शुरू किया कि मैं कुर्सी के पीछे से राज्य पर शासन कर रहा था। मीडिया ने राबड़ी देवी को छद्म मुख्यमंत्री करार दे दिया। लालू उस वक्त चारा घोटाले में जेल में थे। समाचार पत्रों ने ये प्रकाशित करना शुरू किया कि लालू अधिकारियों से मुलाकात करते हैं और उन्हें सख्त निर्देश देते हैं। मीडिया ने यहां तक लिख दिया कि लालू यादव अपने पावर के बल पर जेल में राजसी ठाट के साथ जीवन बिता रहे हैं। लालू ने अपनी आत्मकथा में इस बात का जिक्र करते हुए साफ कहा है कि वे इन बातों से ज्यादा परेशान हो गए।

जंगलराज की टिप्पणी से परेशान लालू

लालू यादव ने अपनी आत्मकथा ‘गोपालगंज से रायसीना’ में ये स्वीकार किया है कि बीजेपी नेताओं ने इस दौरान सुप्रीम कोर्ट से संपर्क साधा। कोर्ट से बीजेपी और समता पार्टी के नेताओं ने कहा कि लालू यादव को जेल मैनुअल का दुरुपयोग करने के कारण उन्हें किसी उचित जेल में भेजा जाए। लालू यादव कहते हैं कि उसी दौरान एक और घटना हुई। एक स्थानीय समाचार पत्र ने झूठी कहानी बनाई। उस कहानी के मुताबिक लालू पर अपने रिश्तेदारों और आंगतुकों के साथ जेल में चिकन, मटन और मछली खाने का आरोप लगाया गया। लालू यादव कहते हैं कि उसके बाद उन्हें पटना के बेउर जेल में भेज दिया गया। लालू यादव मीडिया की इस प्रवृति पर गुस्से में कहते हैं कि मैं पहले ऐसी रिपोर्ट पर गुस्सा होता रहा। बाद में मैंने इस फर्जी पत्रकारिता पर ध्यान देना बंद कर दिया। उन्होंने ऐसी रिपोर्ट के लिए सामंती अभिजात वर्ग को दोषी ठहराया है। लालू यादव ने अपनी आत्मकथा में अखबार के वैसे संवाददाताओं और संपादकों पर गुस्सा जाहिर किया है, जो आरएसएस से प्रभावित रहे।

•लालू पर छद्म सीएम होने का आरोप

लालू यादव जेल में मीडिया के आरोपों का सामना करते हुए परेशान हो रहे थे। तभी एक और घटना होती है। राबड़ी देवी के मुख्यमंत्री बने हुए अभी दस दिन भी नहीं होते हैं कि पटना हाई कोर्ट जर्जर लोक सुविधा के मुद्दे पर सरकारी अधिकारियों को लताड़ लगाता है। पटना हाई कोर्ट राबड़ी शासन के सभी अधिकारियों को अपना कर्तव्य सही तरीके से ननहीं निभाने की बात कहते हुए टिप्पणी करता है। लालू यादव ने आत्मकथा में लिखा है कि राबड़ी के शासन काल के दौरान पटना हाई कोर्ट अपनी टिप्पणी में ‘जंगलराज’ जैसी स्थिति बताता है। लालू के मुताबिक पटना हाई कोर्ट की ये टिप्पणी विरोधियों को शक्तिशाली हथियार दे देती है। विरोधी उनकी अनुपस्थिति में राबड़ी देवी को अनुभवहीन बताते हुए हमला शुरू कर देते हैं। सभी प्रेस कांफ्रेंस और बैठकों में ‘जंगलराज’ की टिप्पणी का इस्तेमाल किया जाने लगता है। लालू यादव ने अपनी आत्मकथा ‘गोपालगंज से रायसीना’ में स्वीकार करते हैं कि विरोधियों को मीडिया का साथ मिलता है और ‘जंगलराज’ को उनके खिलाफ इस्तेमाल किया जाता है।

•लालू जब जेल से छूटे

उसके बाद लालू यादव को 11 दिसंबर 1997 को जमानत पर रिहा कर दिया जाता है। लालू कहते हैं कि मेरी कैद से निराश उत्पीड़ित वर्ग और अल्पसंख्यक मेरे जेल से बाहर आने पर खुश हो जाते हैं। वे इस अवसर को जश्न के रूप में मनाते हैं। लालू ने कहा है कि कई लोग हाथियों और घोड़ों के साथ उनका स्वागत करने पहुंचते हैं। समर्थकों ने कहा कि ‘जेल का फाटक टूट गया, लालू यादव छूट गया’। लालू की परेशान यही कम नहीं होती है। उनके जेल से छूटने के बाद समर्थकों के उत्साह से उनको डर हो जाता है। लालू यादव को पता होता है कि उनके विरोधी इस जश्न और जुलूस को दूसरे हिसाब से चित्रित करेंगे और उनकी छवि को नकारात्मक बनाएंगे। लालू यादव अपने समर्थकों पर चिल्लाते हैं। भीड़ उनकी आवाज को नहीं सुनती है। लालू कहते हैं कि विरोधी उन्हें बुरे आचरण के आरोपी के रूप में चित्रित करने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देते। मीडिया में सुबह खबर छपकर सामने आती है कि जेल से निकलने के बाद लालू ने हाथी की सवारी की। लालू कहते हैं कि ये बिल्कुल गलत बात थी।

 

•’जेल से निकलने के बाद परेशानी’

लालू यादव की आत्मकथा में इस बार का जिक्र है कि उनके जेल से निकलने के बाद एक और मुसीबत उनका इंतजार कर रही थी। वे लेखक नलिन वर्मा को बताते हैं कि इस चिंता में अच्छी बात ये थी कि ये ज्यादा दिन तक नहीं टिकी। लालू यादव कहते हैं कि सीबीआई अवैध संपत्ति के मामले में राबड़ी देवी के खिलाफ चार्जशीट दायर करती है। विपक्षी नेताओं ने इस आरोप को राबड़ी देवी से छुटकारा दिलाने वाले अवसर के तौर पर देखते हैं। उसके बाद विरोधी खुशी मनाते हैं। लालू कहते हैं कि किसी की खुशी ज्यादा लंबे समय तक नहीं टिकी। सीबीआई नामित अदालत ने राबड़ी देवी को बरी कर दिया। सीबीआई ने राबड़ी देवी के खिलाफ चार्जशीट को रद्द कर दिया। राबड़ी मुख्यमंत्री बनी रहीं। लालू यादव ‘भंवर में भी तैरते रहे’ वाले भाग में कहा है कि मैं अपनी चुनौतियों में उलझा हुआ था, उधर नई दिल्ली में तेजी से राजनीतिक परिवर्तन हो रहे थे। संयुक्त मोर्चा सरकार, जिसे लालू की पार्टी ने समर्थन दिया था, वो गिर गई थी। लालू बताते हैं कि देश ने 1998 की शुरुआत में मतदान किया। उस वक्त लालू सुदूर क्षेत्रों में जाना शुरू कर देते हैं।

•’1998 लोकसभा चुनाव की बात’

लालू यादव ने अपनी आत्मकथा ‘गोपालगंज से रायसीना’ मेरी राजनीतिक यात्रा में बताते हैं कि मैंने दृढता के साथ लोगों को बताया कि मैं छद्म रूप से बिहार पर शासन नहीं कर रहा हूं। लालू कहते हैं कि वे लोगों को बताते हैं कि मैं पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष और विधायक भी हूं। मुझे पार्टी को मार्गदर्शन देने का अधिकार है। उसके बाद लालू के खिलाफ विरोधी आवाज बुलंद करते हैं और कहते हैं कि लालू यादव बगैर जिम्मेदारी के सत्ता सुख भोग रहे हैं। लालू यादव ने स्वीकार किया है कि मैं इन आरोपों से परेशान नहीं होता हूं। उसके बाद लालू यादव 1998 में मधेपुरा से लोकसभा सीट पर चुनाव लड़ते हैं। लालू कहते हैं कि विरोधियों की ओर से हर हथियार इस्तेमाल करने के बाद भी लोकसभा चुनाव में राजद को 17 सीटों पर जीत मिलती है। लालू यादव खुद शरद यादव को हरा देते हैं। लालू के मुताबिक इस चुनाव के बाद बीजेपी नेतृत्व वाले एनडीए का गठन होता है और उसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बनते हैं। लालू कहते हैं कि वे बीजेपी के उदय को अनदेखा नहीं कर सकते थे।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Also Read