पीडब्ल्यूडी के उपयंत्री का वायरल ऑडियो: “काम लाना है तो पैसा देना पड़ेगा, मेडम खूब खर्च करती हैं”

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चढ़ावे के बिना नहीं मिलते निर्माण कार्य! बैतूल में कमीशनखोरी से दम तोड़ रहा विकास, भाजपा सरकार की छवि पर दाग
बैतूल। लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) में लंबे समय से चल रही कथित कमीशनखोरी का बड़ा खुलासा एक वायरल ऑडियो से हुआ है। बैतूल जिले के पीडब्ल्यूडी ई डिवीजन के एक वरिष्ठ उपयंत्री का कथित बातचीत वाला ऑडियो सामने आया है, जिसमें वह ठेकेदार को यह समझाते सुनाई दे रहा है कि विभाग में निर्माण कार्य केवल नियमों से नहीं, बल्कि “चढ़ावे” से आगे बढ़ते हैं।
कथित बातचीत में उपयंत्री कहता है—

“काम स्वीकृत करवाना है तो पैसा देना पड़ता है… चढ़ावा चढ़ाना पड़ता है… मेडम खूब खर्च करती हैं… आपको लगता है ऐसे ही काम मिल जाते हैं? डीपीआर बनाने में हमारी जेब से पचास हजार लगते हैं, इसलिए हम आपसे लेते हैं…”
इस बातचीत ने विभाग की कार्यप्रणाली, ठेका स्वीकृति और भुगतान व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगा दिए हैं। संकेत मिल रहे हैं कि सड़क, पुल, भवन सहित अन्य निर्माण कार्यों में स्वीकृति से लेकर बिल भुगतान तक कमीशन का संगठित तंत्र सक्रिय है।
काम नहीं, पहले चढ़ावा चाहिए
कथित वायरल बातचीत ने उस तंत्र की परतें उधेड़ दी हैं जिसमें ठेकेदार की तकनीकी पात्रता से ज्यादा उसकी भुगतान क्षमता मायने रखती है। सूत्रों के अनुसार विभाग में डीपीआर तैयार करने, एस्टीमेट आगे बढ़ाने, प्रशासकीय स्वीकृति दिलाने, माप पुस्तिका भरने, बिल क्लियर कराने और पूर्णता प्रमाण पत्र जारी करने तक अलग-अलग स्तर पर रकम तय होने की चर्चा है।
यानी सरकारी निर्माण कार्य अब विकास योजना कम और प्रतिशत आधारित व्यवस्था ज्यादा बनते जा रहे हैं। ठेकेदारों का कहना है कि जब शुरुआत में ही भारी वसूली होती है तो उसकी भरपाई निर्माण सामग्री और गुणवत्ता में कटौती कर की जाती है।
कमीशनखोरी का असर—उखड़ती सड़कें, अधूरे पुल, जर्जर भवन
पीडब्ल्यूडी के अधीन जिले में करोड़ों रुपये के कई निर्माण कार्य पहले से गुणवत्ता को लेकर चर्चा में रहे हैं। कई सड़कें पहली बारिश में उखड़ने लगीं, कई पुलिया और पुल समय सीमा के बाद भी अधूरे पड़े हैं, जबकि कुछ शासकीय भवन निर्धारित समय से पहले जर्जर नजर आने लगे हैं।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि जब अधिकारी पहले ही कमीशन निकाल लेते हैं तो ठेकेदार गुणवत्तापूर्ण निर्माण कैसे करेगा। इसका सीधा नुकसान आम जनता को खराब और अल्पकालिक सुविधाओं के रूप में भुगतना पड़ रहा है।
“मेडम खूब खर्च करती हैं” — किस तक जाती है उगाही की रकम?
कथित बातचीत का सबसे चर्चित हिस्सा वह है जिसमें उपयंत्री “मेडम खूब खर्च करती हैं” कहकर वसूली को उचित ठहराने की कोशिश करता है। इस एक वाक्य ने विभागीय ढांचे में नीचे से ऊपर तक आर्थिक लेन-देन की आशंका को जन्म दे दिया है।
चर्चा यह भी है कि क्या ठेकेदारों से ली जाने वाली यह रकम किसी बड़े संरक्षण तंत्र तक पहुंचती है? क्या तकनीकी और प्रशासनिक स्वीकृतियां भी अब बिना आर्थिक लेन-देन के संभव नहीं रहीं? यदि इस कथित ऑडियो की निष्पक्ष फॉरेंसिक जांच कराई जाए तो विभाग में जमी कमीशन संस्कृति की कई परतें सामने आ सकती हैं।
भ्रष्ट अधिकारी सरकार की साख पर लगा रहे बट्टा
मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन का दावा करती रही है, लेकिन बैतूल में सामने आया यह मामला सरकारी दावों को कटघरे में खड़ा कर रहा है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष का गृह जिला होने के बावजूद अधिकारियों में कार्रवाई का भय नहीं दिखना कई सवाल पैदा करता है।
जनता के बीच यह संदेश जा रहा है कि बिना चढ़ावे के शासकीय निर्माण कार्य आगे नहीं बढ़ते। ऐसे में सबसे बड़ा नुकसान सरकार की विश्वसनीयता और विकास के दावों को हो रहा है।
उच्चस्तरीय जांच की मांग तेज
अब मांग उठ रही है कि कथित वायरल ऑडियो की तकनीकी जांच कर संबंधित उपयंत्री, कार्यपालन यंत्री और बातचीत में उल्लेखित “मेडम” की भूमिका सार्वजनिक की जाए। लोगों का कहना है कि यदि इस मामले में समय रहते कठोर कार्रवाई नहीं हुई तो पीडब्ल्यूडी में चल रही कमीशनखोरी करोड़ों रुपये के विकास कार्यों को इसी तरह निगलती रहेगी और जनता का भरोसा लगातार टूटता जाएगा।

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